ग्रहण दोष निवारण पूजा
कुंडली में सूर्य या चंद्र ग्रह के साथ राहु-केतु की युति से होने वाले भाग्य अवरोध व मानसिक कष्टों का वैदिक निवारण
ग्रहण दोष क्या है और इसके प्रभाव?
जब जन्मकुंडली के किसी भाव में सूर्य देव या चंद्र देव के साथ राहु या केतु ग्रह आकर बैठ जाते हैं, तो 'ग्रहण दोष' का निर्माण होता है। सूर्य आत्मा, मान-सम्मान, पिता और सरकारी कार्यों के कारक हैं, वहीं चंद्र मन, माता और मानसिक शांति के कारक हैं। सूर्य ग्रहण दोष होने पर व्यक्ति को मान-सम्मान की हानि, पिता से मतभेद और नेत्र/हड्डी के रोग होते हैं। चंद्र ग्रहण दोष होने पर व्यक्ति गंभीर अवसाद (डिप्रेशन), मानसिक भ्रम, और अत्यधिक नकारात्मक विचारों से घिर जाता है। उज्जैन में सूर्य-चंद्र देव की अनुकूलता और राहु-केतु के शमन के लिए विशेष वैदिक हवन और दान विधान संपन्न कराया जाता है।
उज्जैन में पूजा का महत्व:
उज्जैन प्राचीन भारत की खगोलीय वेधशाला (Greenwich of India) रहा है, जहाँ ग्रहों की गति और युतियों का प्रभाव सबसे स्पष्ट होता है। यहाँ नवग्रह पीठ पर किया गया ग्रहण दोष पूजन दोषों का तुरंत शमन करता है।
पूजा विधि (Step-by-Step Vidhi)
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1यजमान संकल्प: ग्रहण दोष के कुप्रभावों को दूर करने और आत्मिक शांति का संकल्प।
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2सूर्य / चंद्र देव आवाहन: पीड़ित प्रकाश ग्रह (सूर्य या चंद्र) की विशेष प्रतिमा व यंत्र की स्थापना।
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3राहु-केतु स्थापना: ग्रहण लगाने वाले छाया ग्रहों (राहु या केतु) की स्थापना व पूजन।
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4ग्रह मंत्र जाप: सूर्य/चंद्र के वैदिक मंत्रों एवं राहु/केतु के मंत्रों का जाप।
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5दोष शांति हवन: मदार (आक) या पलाश की समिधा के साथ नवग्रह समिधा, घी व तिल से हवन।
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6दान अनुष्ठान: तांबा/चांदी, गेहूं/चावल, लाल/सफेद वस्त्र और दक्षिणा का ब्राह्मण को दान।
आवश्यक पूजा सामग्री (Samagri List)
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