कालसर्प दोष निवारण पूजा
महाकाल की पावन नगरी उज्जैन में शास्त्रों में वर्णित विधि से राहु-केतु दोष का निवारण
कालसर्प दोष क्या है और इसके प्रभाव?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब जन्मकुंडली में सभी सात मुख्य ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं, तब 'कालसर्प योग' या 'कालसर्प दोष' का निर्माण होता है। इस दोष के कारण जातक के जीवन में मानसिक अशांति, वैवाहिक जीवन में कलह, संतान प्राप्ति में बाधा, करियर में बार-बार रुकावटें और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आती हैं। उज्जैन शिप्रा नदी के पावन तट और महाकाल की छत्रछाया में इस दोष का निवारण करने से इसके सभी नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाते हैं और जीवन में समृद्धि का उदय होता है।
उज्जैन में पूजा का महत्व:
उज्जैन को मंगल और राहु-केतु का ज्योतिषीय केंद्र माना गया है। भगवान महाकालेश्वर काल के स्वामी हैं और शिप्रा नदी पापों का शमन करने वाली है, इसलिए यहाँ की गई कालसर्प दोष पूजा का फल शीघ्र और अचूक होता है।
पूजा विधि (Step-by-Step Vidhi)
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1शिप्रा स्नान व शुद्धि: यजमान पूजा से पूर्व पावन शिप्रा नदी में स्नान कर पवित्र होते हैं।
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2संकल्प: गोत्र, नाम और मनोकामना के साथ पूजा का संकल्प लिया जाता है।
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3गणेश-गौरी पूजन: सभी विघ्नों के नाश के लिए आदिदेव गणेश और माता गौरी का षोडशोपचार पूजन।
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4नवग्रह पूजन: नौ ग्रहों की शांति और अनुकूलता के लिए ध्यान व अर्घ्य अर्पण।
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5राहू-केतु एवं सर्प देव पूजन: सोने, चांदी या तांबे के नाग-नागिन के जोड़े का पूजन।
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6महाकाल रुद्र अभिषेक: शिवलिंग पर दूध, जल व शहद से अभिषेक।
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7हवन व पूर्णाहुति: सर्प सूक्त मंत्रों से यज्ञ में आहुति देना।
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8विसर्जन: नाग-नागिन के जोड़े का शिप्रा नदी में विसर्जन।
आवश्यक पूजा सामग्री (Samagri List)
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